Tanaji Malsure Balidan Din Battle of snhgad Information History Katha story in Hindi

Tribute tanaji Malsure work history essay Biography
Tanaji Malsure Balidan Din Battle of snhgad Information History Katha story in Hindi
Great Maratha Warrior King

 तानाजी मालसुरे बलिदान दिन
जब शिवाजी महाराजसे रायगढपर मिलनेका संदेश प्राप्त हुआ तब तानाजी मालुसरे उंब्रत गांवमें अपने बेटेके विवाहकी योजनाओंमें व्यस्त थे । वे शीघ्र ही अपने भाई सूर्याजी तथा मामा शेलारमामाके साथ महाराजसे मिलने निकल गए । अपने परममित्र तानाजीको कौनसी मुहीम हेतु चुना है यह बतानेका साहस महाराजके पास नहीं था, अत: उन्होंने तानाजीको मुहीमके विषयमें जानने हेतु जिजाबाईके पास भेजा ।
मुहीमकी भयावहताकी परवाह न करते हुए शेरदिल तानाजीने मरने अथवा मारनेकी प्रतिज्ञा की । तानाजीने रातको मुहीमका आरंभ किया तथा कोकणकी ओरसे छुपकर वर्ष १६७० में फरवरीकी ठंडी, अंधेरी रातमें अपने साथियोंको लेकर किलेकी ओर प्रस्थान किया । वह अपने साथ शिवाजी महाराजकी प्रिय गोह ले गए थे, जिससे किलेपर चढनेमें आसानी हो । इस प्राणीकी कमरमें रस्सी बांधकर उसके सहारे किलेपर पहुंचनेका प्रयास किया, किंतु गोह ऊपर चढना नहीं चाहती थी, जैसे वह आगे आनेवाले संकटके विषयमें तानाजीको आगाह कराना चाहती थी । तानाजी बडे क्रोधित हुए गोह उनका संकेत समझ गई, तथा तटबंदीसे चिपक गई, जिससे मराठा सैनिकोंको किलेपर चढनेमें मदद मिली ।


लगभग ३०० लोग ही अबतक ऊपरतक चढ पाए थे, कि पहरेदारोंको उनके आनेकी भनक हो गई । मराठा सैनिकोंने पहरेदारोंको तुरंत काट डाला, किंतु शस्त्रोंकी खनखनाहटसे गढकी रक्षा करनेवाली सेना जाग गई । तानाजीके सामने बडी गंभीर समस्या खडी हुई । उनके ७०० सैनिक अभी नीचे ही खडे थे तथा उन्हें अपनेसे कहीं अधिक संख्यामें सामने खडे शत्रुसे दो-दो हाथ करने पडे । उन्होंने मन-ही-मन निश्चय किया तथा अपने सैनिकोंको चढाई करनेकी आज्ञा की । लडाई आरंभ हो गई । तानाजीके कई लोग मारे गए, किंतु उन्होंने भी मुगलोंके बहुत सैनिकोंको मार गिराया । अपने सैनिकोंकी हिम्मत बढाने हेतु तानाजी जोर-जोरसे गा रहे थे । थोडे समयके पश्चात मुगलोंका सरदार उदय भान तानाजीसे लडने लगा । मराठोंको अनेक अडचनें आ रही थीं । रातकी लंबी दौड, मुहीमकी चिंता, किलेकी दुर्ग चढकर आना, तथा घमासान युद्ध करना; इन सारी बातोंपर तानाजी पूर्वमें ही कडा परिश्रम कर चुके थे, इसपर उदय भानने युद्ध कर उन्हें पूरा ही थका दिया; परिणामस्वरूप लंबी लडाईके पश्चात तानाजी गिर गए ।
अपने नेताकी मृत्युसे मराठोंके पांवतलेसे भूमि खिसक गई । तानाजीने जितना हो सका, उतने समय युद्ध जारी रखा , जिससे नीचे खडे ७०० सैनिक पहरा तोडकर अंदर घुसनेमें सफल हों । वे तानाजीके बंधु सूर्याजीके नेतृत्वमें लड रहे थे । सूर्याजी बिलकुल समयपर पहुंच गए तथा उनकी प्रेरणासे मराठोंको अंततक लडनेकी हिम्मत प्राप्त हुई । मुगल सरदारकी हत्या हुई तथा पूरे किलेकी सुरक्षा तहस नहस हो गई । सैकडों मुगल सिपाही स्वयंको बचानेके प्रयासमें किलेसे कूद पडे तथा उसमें मारे गए ।
मराठोंको बडी विजय प्राप्त हुई थी किंतु उनकी छावनीमें खुशी नहीं थी । जीतका समाचार शिवाजी महाराजको भेजा गया था, जो तानाजीका अभिनंदन करने तुरंत गढकी ओर निकल पडे, किंतु बडे दुखके साथ उन्हें उस शूर वीरकी मृत देह देखनी पडी । सिंहगढका कथागीत इस दुखका वर्णन कुछ इस प्रकार करता है :
तानाजीके प्रति महाराजके मनमें जो प्रेम था, उस कारण वे १२ दिनोंतक रोते रहे । जिजाबाईको हुए दुखका भी वर्णन किया है : चेहरेसे कपडा हटाकर उन्होंने तानाजीका चेहरा देखा । विलाप करते हुए उन्होंने समशेर निकाली और कहा, `शिवाजी महाराज, जो एक राजा तथा बेटा भी है, आज उसकी देहसे एक महत्वपूर्ण हिस्सा कट चुका है ।’ शिवाजी महाराजको अपने मित्रकी मृत्युकी सूचना प्राप्त होते ही उन्होंने कहा, `हमने गढ जीत लिया है, किंतु एक सिंहको खो दिया है’ ।
तानाजी मालुसरे का महापराक्रम तथा स्वराज्य अर्थात् धर्मके प्रति उनकी निष्ठा को हम अभिवादन करतें हैं । आज प्रत्येक हिंदूने इनसे प्रेरणा लेकर धर्म तथा राष्ट्ररक्षण के लिए सिद्ध होना यहीं कालकी अत्यावश्यकता है !
Powered by Blogger.